ब्राह्मणों के लिए गायत्री का महत्व ? Gayatri importance for Brahman

गायत्रीसे रहित ब्राह्मण निन्दनीय है

जो ब्राह्मण उपनयन संस्कार होनेके बाद गायत्रीकी उपासना (जप) करता है, वह परम पवित्र ब्राह्मण कहा जाता है और जो गायत्रीकी उपासना नहीं करता, वह परम अपवित्र ब्राह्मण कहा जाता है।

‘गायत्रीरहितो विप्रः शूद्रादप्यशुचिर्भवेत् ।’
(पाराशरस्मृति ८।३२)

‘गायत्रीसे रहित ब्राह्मण अधिक अपवित्र होता है।’
गायत्रीसे रहित ब्राह्मणके बारेमें तो यहाँ तक लिखा है-

गायत्रीरहितो विप्रो न स्पृशेत् तुलसीदलम् ।
हरेर्नाम न गृह्णीयात् गायत्रीरहितो द्विजः ॥
महाचण्डालसदृशस्तस्य किं
विष्णुपूजने ।।
(गायत्रीतन्त्र, तृतीयपटल).

‘गायत्रीसे रहित जो ब्राह्मण है, वह तुलसीदलका स्पर्श न करें। गायत्रीसे रहित द्विज भगवान् विष्णुका नामोच्चारण न करें। क्योंकि वह द्विज गायत्रीसे रहित होनेके कारण महाचाण्डालके सदृश कहा गया है। अतः उसके किये हुए विष्णुपूजनसे क्या लाभ ?’
ब्राह्मणके लिये गायत्रीकी उपासना परमावश्यक कही गयी है। जो ब्राह्मण गायत्रीकी उपासना करता है, वही ब्राह्मणत्व को प्राप्त करता है और जो गायत्रीकी उपासना नहीं करता, वह ब्राह्मणत्वसे च्युत हो जाता है। अतः ब्राह्मणत्वकी प्राप्तिके लिये गायत्रीकी उपासना ही श्रेष्ठ साधन है।

ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति गायत्रीकी उपासनासे ही हो सकती है, न कि वेदादि शास्त्रोंके पढ़नेसे। लिखा भी है-

न ब्राह्मणो वेद‌पाठान्न शास्त्रपठनादपि । देव्यास्त्रिकालमभ्यासाद् ब्राह्मणः स्याद्धि नान्यथा ॥
(स्कन्दपुराण, काशीखण्ड, पूर्वार्ध, ४१।७७)

‘वेदोके पढ़नेसे अथवा शास्त्रों के अध्ययन से कोई ब्राह्मण नहीं हो सकता। त्रिकाल सन्ध्यामें गायत्री देवी के बार-बार उच्चारणसे ही ब्राह्मण हो सकता है, अन्यथा नहीं ।’

महर्षि पराशरने कहा है कि जो ब्राह्मण गायत्री-उपासनाविहीनः है, वह समस्त शास्त्रोंका अध्ययन करने पर भी ब्राह्मणत्व प्राप्त नहीं कर सकता-

किं वेदैः पठितैः सर्वैः सेतिहासपुराणकैः ।
साङ्गैः सावित्रीहीनो यो न विप्रत्वमवाप्नुयात् ॥
( बृहत् पाराशरस्मृति ५/१४).
‘समस्त अङ्गों और इतिहास-पुराणके साथ सभी वेदोंके अध्ययन-से उस पुरुषका क्या लाभ ? जिसने सावित्रीहीन होनेसे विप्रत्वः (द्विजत्व) प्राप्त नहीं किया।’

अतः स्पष्ट है कि द्विजत्वकी प्राप्ति केवल गायत्रीकी उपासनासे ही हो सकती है। इसलिये द्विजत्वकी प्राप्ति के लिये गायत्रीकी उपासना आवश्यक है ।
आचार्य अनूप त्रिपाठी वेदवार्ता

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